मानसिक स्वास्थ्य : वैश्विक परिप्रेक्ष्य और भारत

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  • मनीषा वर्मा

मानसिक स्वास्थ्य केवल मानसिक प्रसन्नता का नाम नहीं है, बल्कि यह हमारी भावनात्मक, संज्ञानात्मक, सामाजिक और शारीरिक क्षमताओं का समग्र संतुलन है। एक स्वस्थ मन न केवल चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने में सक्षम बनाता है, बल्कि जीवन को पूर्णता से जीने का मार्ग भी प्रशस्त करता है।

विश्व स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य को एक मौलिक मानवाधिकार माना गया है और यह व्यक्तिगत, सामुदायिक तथा सामाजिक-आर्थिक प्रगति का आधार है। वैश्विक महामारी कोविड-19 ने मानसिक स्वास्थ्य पर संवाद को नए सिरे से केंद्रित किया और इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंडा के केंद्र में ला दिया।

मानसिक स्वास्थ्य: वैश्विक स्थिति

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य स्थितियाँ दुनिया भर में दिव्यांगता के प्रमुख कारणों में से एक हैं। वर्ष 2021 में विश्व स्तर पर 7 में से 1 व्यक्ति किसी न किसी मानसिक विकार के साथ जीवन जी रहा था—यह संख्या 1.1 बिलियन से अधिक है। भारत में हर 100 में से लगभग 11 लोग मानसिक स्वास्थ्य विकार से प्रभावित पाए गए। सतत विकास लक्ष्य (SDG 2030) का लक्ष्य 3—सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज और मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन—इस चिंता की वैश्विक गंभीरता को दर्शाता है। अवसाद एवं चिंता विकार, विशेष रूप से 15–29 वर्ष के युवाओं में, मानसिक बीमारी से जुड़े वर्षों (YLDs) में बड़े योगदानकर्ता हैं।

लैंसेट (2020) के अनुसार – मानसिक स्वास्थ्य विकार वैश्विक रोग बोझ का 5.2% हिस्सा हैं। अकेले अवसाद और चिंता कुल YLDs का क्रमशः 6.2% और 4.7% हिस्सा रखते हैं।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (NIMHANS) के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015-16) के अनुसार – 10.6% भारतीय वयस्क, यानी हर 100 में से 11, किसी नैदानिक मानसिक विकार से ग्रसित हैं। जीवनकाल प्रसार (Lifetime prevalence) 13.7% पाया गया—अर्थात हर 100 में से 14 ने जीवन में किसी न किसी समय मानसिक विकार का अनुभव किया। मानसिक विकार शहरी क्षेत्रों (13.5%) में ग्रामीण क्षेत्रों (6.9%) की तुलना में अधिक पाए गए। महिलाओं में इन विकारों का प्रसार पुरुषों की तुलना में दोगुना पाया गया।

भारत में बढ़ती आत्महत्या दर

NCRB (2023) रिपोर्ट के अनुसार – वर्ष 2023 में 1,71,418 आत्महत्याएँ दर्ज की गईं। इनमें 72.8% पुरुष और 27.2% महिलाएँ थीं। यह संकेत देता है कि मानसिक स्वास्थ्य संकट सार्वजनिक स्वास्थ्य का अत्यंत गंभीर विषय बन चुका है।

उपचार का अंतर और संसाधनों की कमी

NIMHANS (2015-16) सर्वेक्षण के अनुसार, मानसिक विकारों से पीड़ित 70–92% लोग उपचार नहीं ले पाते।
कारण: जागरूकता की कमी, सामाजिक कलंक, योग्य पेशेवरों की कमी।

WHO प्रति 1 लाख आबादी पर 3 मनोचिकित्सक की सिफारिश करता है, जबकि भारत में यह संख्या केवल 0.75 है।

खराब मानसिक स्वास्थ्य का प्रभाव

  1. स्वास्थ्य पर प्रभाव – WHO के अनुसार, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। अवसाद से हृदय रोग का खतरा 72% तक बढ़ जाता है। दीर्घकालिक दर्द, नींद की गड़बड़ी और कम जीवन प्रत्याशा के मामले भी अधिक होते हैं।
  2. आर्थिक प्रभाव – खराब मानसिक स्वास्थ्य से वैश्विक अर्थव्यवस्था को 1 ट्रिलियन डॉलर हर वर्ष का नुकसान (उत्पादकता में कमी) होता है। वर्ष 2030 तक मानसिक स्वास्थ्य का वैश्विक वित्तीय बोझ 16 ट्रिलियन डॉलर पहुँचने का अनुमान है।
  3. सामाजिक प्रभाव – मानसिक विकारों वाले लोग सामाजिक अलगाव, तनावपूर्ण संबंधों और अवसाद से जूझते हैं। गंभीर विकारों, विशेषकर सिज़ोफ्रेनिया वाले लोगों को भेदभाव और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है।
  4. आत्महत्या का जोखिम – मानसिक विकार वाले व्यक्ति आत्महत्या का 16 गुना अधिक जोखिम रखते हैं।
  5. युवा सर्वाधिक प्रभावित – 50% मानसिक विकार 14 वर्ष की उम्र में, 75% मानसिक विकार 24 वर्ष की उम्र तक शुरू हो जाते हैं। ये स्थितियाँ शिक्षा, व्यवहार और दीर्घकालिक जीवन परिणामों पर गहरा प्रभाव डालती हैं।

कोविड-19 महामारी का मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

चिंता और अवसाद के मामलों में लगभग 25% वृद्धि।
सामाजिक अलगाव से अकेलापन और निराशा में वृद्धि।
बेरोजगारी और आर्थिक संकट ने तनाव को और बढ़ाया।

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