उत्तराखंड पेयजल निगम में 2660 करोड़ का घोटाला: आरटीआई एक्टिविस्ट नेगी का बड़ा खुलासा

सीएजी रिपोर्ट के आधार पर वर्षों से अनऑडिटेड खातों, ठेकेदारों को अवैध भुगतान, जीएसटी व रॉयल्टी न देने सहित व्यापक वित्तीय अनियमितताओं का आरोप; विधानसभा में रिपोर्ट पेश न करने पर भी उठाए सवाल
आरटीआई एक्टिविस्ट एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने देहरादून कचहरी स्थित अपने कक्ष में आयोजित पत्रकार वार्ता में उत्तराखंड पेयजल निगम में वर्षों से जारी वित्तीय अनियमितताओं का गंभीर और तथ्य-आधारित खुलासा किया। नेगी इससे पहले भी सैन्यधाम प्रकरण, नगर निगम अनियमितताओं और चाय बागान भूमि घोटाले जैसे मामलों को उजागर कर चुके हैं।
2660 करोड़ से अधिक की वित्तीय अनियमितता का दावा
नेगी ने बताया कि उन्हें सीएजी रिपोर्ट के आधार पर मिली आरटीआई सूचना से पता चला कि वर्ष 2016 से मई 2024-25 तक पेयजल निगम में कुल 2660 करोड़ 27 लाख रुपये की अनियमितताएँ दर्ज की गई हैं। कई वर्षों तक विभाग ने अनिवार्य वार्षिक आडिट तक नहीं कराया, जिसे उन्होंने “भ्रष्टाचार को छिपाने की संगठित रणनीति” बताया। नेगी ने कहा कि कोविड संकट के दौरान भी 829.90 करोड़ रुपये की गड़बड़ी होना “मानवीय संवेदनहीनता और वित्तीय अपराध का गंभीर उदाहरण” है।
बिना कार्य और बिना गारंटी के भुगतान, जीएसटी व रॉयल्टी की भी अनदेखी
अधिवक्ता नेगी के अनुसार कई ठेकेदारों ने जीएसटी का भुगतान तक नहीं किया, फिर भी विभाग ने किसी पर कार्रवाई नहीं की। कई मामलों में बिना कार्य पूर्ण हुए और बिना बैंक गारंटी के ही अग्रिम भुगतान जारी कर दिया गया। निर्माण कार्यों में अनिवार्य रॉयल्टी तक नहीं ली गई और कई निर्माणों की गुणवत्ता बेहद निम्न पाई गई।
उन्होंने इसे “अनियमितता नहीं, बल्कि साजिश के तहत किया गया संगठित आर्थिक अपराध” बताया, जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत गंभीर दंडनीय अपराध है।
सीएजी रिपोर्ट विधानसभा में पेश न होने पर सवाल
नेगी ने कहा कि इतनी बड़ी गड़बड़ी के बावजूद सीएजी रिपोर्ट को अब तक विधानसभा में प्रस्तुत नहीं किया गया, जो संवैधानिक परंपराओं का सीधा उल्लंघन है। रिपोर्ट को पेश न करना “तथ्यों को दबाने का प्रयास” माना जा रहा है। उनकी मांग है कि रिपोर्ट पर चर्चा कर जवाबदेही तय की जाए।
एसआईटी, विजिलेंस या सीबीआई जांच की मांग
नेगी ने इस पूरे मामले की शिकायत मुख्यमंत्री को भेजते हुए उच्चस्तरीय, निष्पक्ष और प्रभाव-रहित जांच की मांग की है। उनका कहना है कि 2660 करोड़ रुपये से अधिक की गड़बड़ी किसी विभागीय औपचारिक जांच से स्पष्ट नहीं हो सकती; इसलिए एसआईटी, विजिलेंस या सीबीआई जैसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच आवश्यक है।
