उर्मिला फाइल्स: ‘पार्टी विद ए डिफरेंस’ की कसौटी पर भाजपा, ‘नैतिक’ इस्तीफे की बहस तेज

उत्तराखंड की बहुचर्चित उर्मिला फाइल्स में कितना सच है और कितना झूठ, यह तय करना फिलहाल आसान नहीं है। लेकिन इतना तय है कि इस पूरे प्रकरण ने प्रदेश की राजनीति के कई चमकीले पन्नों पर गहरे काले छींटे जरूर छोड़ दिए हैं। लंबे समय तक विपक्ष की भूमिका से लगभग गायब रही कांग्रेस अब आगामी उत्तराखंड विधानसभा चुनावों (करीब 13–14 महीने शेष) को देखते हुए उर्मिला फाइल्स से उठती राजनीतिक सड़ांध को पूरी ताकत से वायरल करने में जुट गई है।
देवभूमि के रूप में पहचाने जाने वाले उत्तराखंड में सत्ता और राजनीति की चकाचौंध के पीछे इतनी गंदगी हो सकती है—यह देखकर आम जनमानस हैरान है। इस प्रकरण से सबसे अधिक स्तब्ध वे भाजपा नेता और कार्यकर्ता हैं, जो दशकों से “पार्टी विद ए डिफरेंस” की अवधारणा में विश्वास करते आए हैं और भाजपा को उच्च नैतिक मूल्यों व आदर्शों का प्रतीक मानते रहे हैं।
VIP नामों की चर्चा और कार्यकर्ताओं की बेचैनी
अंकिता भंडारी प्रकरण में वीआईपी के तौर पर भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री व उत्तराखंड प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम और प्रदेश संगठन मंत्री अजेय कुमार के नाम उछलने का मामला हो या फिर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को लेकर उर्मिला सनावर के लाइव वीडियो—इन सभी घटनाक्रमों ने सबसे अधिक विचलित भाजपा के आम कार्यकर्ता को ही किया है।
हालांकि पार्टी अनुशासन, संगठनात्मक मर्यादा और जल में रह कर मगर से बैर, जैसे कारणों के चलते अधिकांश भाजपाई सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करने से बच रहे हैं, लेकिन भीतरखाने बेचैनी साफ महसूस की जा रही है। इसके बावजूद कुछ नेता और कार्यकर्ता खुलकर अपनी प्रतिक्रिया सामने रख रहे हैं।

त्रिवेंद्र रावत से लेकर कई अन्य नेता कर चुके हैं सार्वजनिक टिप्पणी
हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र से भाजपा सांसद और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मामले को बेहद गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि जिस तरह के ऑडियो-वीडियो और नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं, उससे समाज और राजनीति—दोनों की छवि प्रभावित हो रही है। उनका साफ कहना था कि दोषी को सामने लाया जाना चाहिए और उसे सजा भी मिलनी चाहिए।
वहीं, उत्तराखंड विधानसभा की पूर्व अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री रह चुकीं वरिष्ठ भाजपा नेत्री विजय बड़थ्वाल ने बाकायदा प्रेस नोट जारी कर पूरे घटनाक्रम पर गहरी चिंता जताई और सीबीआई जांच की मांग कर डाली। उन्होंने कहा कि न्याय होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी उतना ही जरूरी है।

RSS पृष्ठभूमि से जुड़े वरिष्ठ नेता और भाजपा पंचायत प्रकोष्ठ के पूर्व प्रदेश संयोजक दिगंबर सिंह नेगी ने अपनी फेसबुक पोस्ट में कथित रूप से आरोपित नेताओं को तत्काल पार्टी से निष्कासित करने और मामले की सीबीआई जांच की मांग की। उन्होंने लिखा कि भाजपा कार्यकर्ताओं के परिश्रम और बलिदान से बनी पार्टी है, और कुछ नेताओं के कुकर्मों को ढकने की कोशिश पूरी पार्टी और विचारधारा पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रही है। नेगी की इस पोस्ट पर कई भाजपा कार्यकर्ताओं ने समर्थन में टिप्पणी भी की है।

इसी क्रम में भाजपा संस्कृति प्रकोष्ठ की पूर्व प्रदेश सह-संयोजक और संस्कृतिकर्मी शोभना रावत स्वामी ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा—“अब समझ में आ रहा है कि राजनीति कैसे की जाती है?”

इस्तीफे की मांग और आडवाणी का उदाहरण
भाजपा के कई नेता भले ही सार्वजनिक रूप से चुप हैं, लेकिन अंदरूनी चर्चाओं में यह बात जोर पकड़ रही है कि जिन नेताओं के नाम इस मामले में उछल रहे हैं, उन्हें नैतिक आधार पर अपने पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए—भले ही वे दोषी सिद्ध हों या नहीं। पार्टी को व्यापक नुकसान से बचाने के लिए यह कदम जरूरी बताया जा रहा है।
ऐसी चर्चा करने वाले नेता भारत रत्न लालकृष्ण आडवाणी के उस ऐतिहासिक उदाहरण का हवाला दे रहे हैं, जब जैन हवाला कांड में नाम आने के बाद उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया था। आडवाणी ने यह कहते हुए 1996 का चुनाव तक नहीं लड़ा था कि एक नेता के लिए जनता का भरोसा और नैतिकता सर्वोपरि होती है। बाद में हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट से बरी होने के बाद उन्होंने 1998 में चुनाव लड़ा और भारी बहुमत से जीत दर्ज की।
नैतिकता बनाम राजनीति
आज उर्मिला फाइल्स के बहाने उत्तराखंड की राजनीति एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी दिख रही है—जहां सवाल सिर्फ कानूनी दोष-निर्दोष का नहीं, बल्कि राजनीतिक नैतिकता, जवाबदेही और सार्वजनिक भरोसे का है। आने वाले चुनावी महीनों में यह मुद्दा किस करवट बैठेगा, यह तय करेगा कि देवभूमि की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी।
