भैरव सेना की मांग : चारधाम में गैर सनातनियों का प्रवेश रोकने को ‘पंचगव्य आचमन’ हो अनिवार्य

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भैरव सेना के केंद्रीय अध्यक्ष संदीप खत्री के नेतृत्व में संगठन के प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार को जिलाधिकारी, देहरादून के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन प्रेषित किया। ज्ञापन में आगामी चारधाम यात्रा से पूर्व तीर्थ क्षेत्रों में गैर सनातनियों के प्रवेश को रोकने के लिए ‘पंचगव्य आचमन’ अनिवार्य करने और ‘तीर्थ सुधार नियमावली-1924’ को लागू करने संबंधी शासनादेश जारी करने की मांग की गई है।

संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि यात्रा शुरू होने से पहले इस संबंध में ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो वह “शुद्धिकरण अभियान” चलाने के लिए आंदोलनात्मक कदम उठाएगा।

केंद्रीय अध्यक्ष संदीप खत्री ने बताया कि संगठन पिछले पांच वर्षों से चारधाम यात्रा से दो सप्ताह पूर्व जन जागरण हेतु ‘सात दिवसीय पंचगव्य यात्रा’ का आयोजन करता आ रहा है। उनके अनुसार इस पहल का उद्देश्य तीर्थों की शुचिता बनाए रखना और श्रद्धालुओं में जागरूकता बढ़ाना है।
उन्होंने कहा कि यदि सरकार ने इस वर्ष भी मांगों पर शासनादेश जारी नहीं किया, तो अभियान को जन-आंदोलन का रूप दिया जाएगा।

जिलाध्यक्ष संजीव टांक ने कहा कि गढ़वाल के चारों धाम और शक्तिपीठ आस्था के प्रमुख केंद्र हैं और बाहरी तत्वों की कथित अनियंत्रित गतिविधियों से जनसांख्यिकीय संतुलन प्रभावित होने की आशंका जताई। उन्होंने प्रशासन से त्वरित निर्णय की मांग की।

महानगर अध्यक्षा नीलम थापा ने कहा कि समाज केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होगा और तीर्थ क्षेत्रों के प्रवेश द्वारों पर ‘पंचगव्य आचमन’ की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।

गढ़वाल संभाग अध्यक्ष गणेश जोशी और जिला संयोजिका नेहा भंडारी ने कहा कि तीर्थ क्षेत्रों में गैर-सनातनियों और संदिग्ध तत्वों की घुसपैठ पर पूर्ण प्रतिबंध लगना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि प्रशासन द्वारा कार्रवाई नहीं की गई तो संगठन के स्वयंसेवक स्वयं मोर्चा संभालेंगे।

इस अवसर पर अन्नू राजपूत, गीता नौटियाल, कल्पना भंडारी, रविन्द्र चौधरी, राजकुमार, राहुल सूद और योगेंद्र कुमार गौतम बाली सहित अन्य कार्यकर्ता उपस्थित रहे।


‘पंचगव्य आचमन’ हिंदू धार्मिक परंपरा से जुड़ा एक शुद्धिकरण अनुष्ठान माना जाता है, जिसमें गौ से प्राप्त पांच तत्व—दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर—से तैयार मिश्रण का विधि-विधान के साथ आचमन (अल्प मात्रा में ग्रहण या स्पर्श) कराया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसे आत्मिक एवं पर्यावरणीय शुद्धि का प्रतीक माना जाता है और विशेष अनुष्ठानों, यज्ञों या पवित्र स्थलों पर प्रवेश से पूर्व इसका प्रयोग कुछ परंपराओं में किया जाता है।

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