उर्मिला फाइल्स का सियासी तूफान : उत्तराखंड भाजपा में फेरबदल की चर्चा

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प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और महामंत्री संगठन अजेय कुमार (फोटो - सोशल मीडिया)

उत्तराखंड (Uttarakhand) की राजनीति में इन दिनों बहुचर्चित उर्मिला फाइल्स ने जबरदस्त हलचल मचा रखी है। बीते एक माह से यह मामला न केवल राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है, बल्कि इससे प्रदेश की सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के बीच तीखी सियासी जंग भी छिड़ गई है। जहां कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल इसे वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक हथियार के तौर पर भुना रहे हैं, वहीं भाजपा के लिए यह मामला गले की फांस बनता नजर आ रहा है।

इसी राजनीतिक उबाल के बीच भाजपा संगठन में बड़े फेरबदल की अटकलें तेज हो गई हैं। चर्चा है कि चुनावी तैयारियों को धार देने के उद्देश्य से भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और प्रदेश संगठन महामंत्री अजेय कुमार को बदला जा सकता है।

भाजपा के भीतर ही प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट की लगातार विवादित बयानबाजी को लेकर असहजता बढ़ती जा रही है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता मानते हैं कि यदि उर्मिला प्रकरण पर संयमित बयान दिए जाते, तो मामला इतना तूल न पकड़ता। भट्ट के बयानों के बाद अंकिता प्रकरण में जातिगत कोण जुड़ने से पार्टी को राजनीतिक नुकसान की आशंका भी जताई जा रही है।

उर्मिला पर दिए गए बयान के बाद जिस तरह से उस महिला ने भाजपा अध्यक्ष के बारे में लाइव आ कर टिप्पणियां की, उससे पूरी पार्टी खास कर महिला नेत्रियां सकते में हैं। पार्टी अनुशासन के नाम पर भले ही महिला नेत्रियां खुल कर कुछ नहीं बोल पा रही हैं। मगर अंदर खाने यह चर्चा है कि उर्मिला द्वारा भाजपा अध्यक्ष के बारे में की गई टिप्पणियों से लोगों के बीच महिला नेत्रियों की छवि पर प्रतिकूल असर पड़ा है।

अधिकांश भाजपाइयों का मानना है कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष भट्ट के बारे में सोशल मीडिया पर यूज़र्स का जो परसेप्शन बन गया है, वह भाजपा संगठन की छवि के लिए नुकसानदायक है।

प्रदेश संगठन महामंत्री अजेय कुमार को लेकर भी चर्चाएं जोरों पर हैं। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के निवासी अजेय करीब 6 वर्ष से उत्तराखंड में संगठन मंत्री के रूप में कार्यरत हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक के तौर पर लंबे समय से काम कर रहे अजेय अपनी तड़क-भड़क वाली लाइफ स्टाइल के कारण अन्य प्रचारकों के लिए भी ईर्ष्या का कारण बने रहते हैं।

अजेय साल 2022 में उत्तराखंड विधानसभा में बैकडोर नियुक्तियों को लेकर हुए हंगामे के समय पहली बार चर्चाओं में आए थे। आरोप था कि विधानसभा में कई प्रभावशाली लोगों ने अपने चहेतों को नियम विरुद्ध नियुक्तियां दिलाई हैं। इन प्रभावशाली लोगों में RSS के तीन वरिष्ठ प्रचारकों समेत अजेय पर भी अपने चहेतों को नियुक्ति दिलाने का आरोप लगा था।

हालांकि, भारी बवाल के बीच विधानसभा अध्यक्ष ने इन नियुक्तियों को निरस्त कर दिया था। मगर RSS ने नियुक्ति प्रकरण की जद में आए तीनों प्रचारकों को उत्तराखंड से बाहर अन्य पदों पर भेज दिया था। उस समय अजेय को भी हटाए जाने की चर्चाएं जोरों पर रहीं, किंतु यह बात चर्चाओं तक ही सीमित रही।

अंकिता हत्याकांड के बाद एक बार फिर अजेय तब चर्चाओं में आए, जब अंकिता के माता-पिता ने सार्वजनिक रूप से कथित VIP के रूप में उनका नाम लिया। अंकिता के पिता ने जनवरी 2024 में बाकायदा पौड़ी के जिलाधिकारी को एक पत्र लिखकर कर अजेय का नाम का जिक्र किया।

इसके बाद तमाम स्तरों पर अजेय के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठी थी। सोशल मीडिया पर कथित VIP के रूप में अजेय को लेकर यूजर्स जमकर भाजपा और RSS पर निशाना साधते रहे हैं।

उर्मिला फाइल्स के बाद दुष्यंत गौतम के साथ ही एक बार फिर अजेय का नाम जिस तरह से दुबारा उछला उससे भाजपा को कई सवालों का सामना करना पड़ रहा है। यह भी गौरतलब है कि जहां गौतम ने अपने ऊपर लगे आरोपों पर विस्तृत सफाई दी और यात्रा कार्यक्रम सार्वजनिक किए, वहीं अजेय ने आरोपों पर लगातार चुप्पी साध रखी है।

उत्तराखंड का मुख्यधारा का मीडिया अजेय के मामले में भले ही मौन हो। मगर सोशल मीडिया में आ रही प्रतिक्रियाओं ने भाजपा के कर्ताधर्ताओं के साथ ही RSS की पेशानी पर भी बल डाल दिया है। अजेय से पहले संगठन मंत्री रहे संजय कुमार को भी महिला से संबंधित विवादित कारण से हटना पड़ा था। लगातार ऐसे प्रकरणों से RSS की साख पर भी असर पड़ रहा है।

सूत्रों का यहां तक दावा है कि RSS ने अजेय से कन्नी काट दी है और – उन्हें पद पर रखना है या नहीं, यह भाजपा को तय करना है, कह कर गेंद भाजपा के पाले में डाल दी है।

सूत्र बताते हैं कि आजकल अजेय कुमार भाजपा मुख्यालय भी कभी-कभार आ रहे हैं। कार्यकर्ताओं के सामने वो सामान्य दिखने की कोशिश कर रहे हैं।

सूत्रों का दावा है कि भाजपा हाईकमान संगठन की छवि और आगामी चुनावी रणनीति को देखते हुए जल्द बड़ा फैसला ले सकता है। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री—दोनों पदों पर बदलाव की संभावनाओं को नकारा नहीं जा रहा है।


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