पति की मौत ने छीन लिया सहारा, प्रशासन की मदद ने लौटाई उम्मीद

व्यवस्था संवेदनशील हो, तो टूटती उम्मीदों को भी मिलता है नया जीवन
एक हादसा, जिसने परिवार का सहारा छीन लिया… और उसके बाद आर्थिक तंगी, बैंक का कर्ज और तीन मासूम बच्चों की जिम्मेदारी। यह कहानी है देहरादून की शांति राणा की, जिनके लिए जीवन उस वक्त और कठिन हो गया, जब उनके पति मनबहादुर की सड़क दुर्घटना में आकस्मिक मृत्यु हो गई।
पति के जाने के बाद न सिर्फ घर की आय बंद हो गई, बल्कि ई-रिक्शा खरीदने के लिए लिया गया बैंक ऋण भी शांति राणा के लिए एक असहनीय बोझ बन गया। हर दिन यह डर सताने लगा कि बच्चों की पढ़ाई और भविष्य कैसे संभलेगा ?
जनता दर्शन में छलके दर्द भरे शब्द
नवंबर माह में देहरादून जिला प्रशासन द्वारा आयोजित जनता दर्शन कार्यक्रम के दौरान शांति राणा ने जब अपनी पीड़ा साझा की, तो यह सिर्फ एक शिकायत नहीं, बल्कि एक मां की बेबसी और भविष्य की चिंता थी। उन्होंने बताया कि उनके पति ने परिवार की आजीविका के लिए 3,72,600 रुपये का बैंक ऋण लेकर ई-रिक्शा खरीदा था, लेकिन दुर्घटना ने सब कुछ छीन लिया।
आज शांति राणा अपने 12 वर्षीय बेटी अंशिका, 5 वर्षीय बेटे अक्षय और एक किशोर पुत्र के साथ जीवन की कठिन राह पर चल रही हैं। सीमित साधनों में बैंक की किस्तें भरना उनके लिए असंभव हो चुका था।
प्रशासन ने बढ़ाया सहारा
प्रकरण की गंभीरता को समझते हुए जिलाधिकारी सविन बंसल ने मानवीय पहल करते हुए शांति राणा को बड़ी राहत दी। सीएसआर फंड से 4 लाख रुपये की सहायता राशि सीधे उनके बैंक खाते में हस्तांतरित की गई, जिससे उनका पूरा बैंक ऋण समाप्त हो गया।
इतना ही नहीं, प्रशासन ने यह भी सुनिश्चित किया कि आर्थिक संकट बच्चों की पढ़ाई में बाधा न बने। शांति राणा की बेटी अंशिका की कक्षा 12वीं तक की पूरी फीस—1.62 लाख रुपये—एकमुश्त स्कूल प्रबंधन के खाते में जमा कराई गई।
रोजगार और स्थायी सहारे की पहल
प्रशासन ने केवल तात्कालिक राहत तक सीमित न रहते हुए शांति राणा को योग्यता के अनुरूप रोजगार से जोड़ने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। साथ ही संबंधित विभागों को निर्देश दिए गए हैं कि परिवार को सरकारी योजनाओं, सामाजिक सुरक्षा लाभों और अन्य सहायता योजनाओं से जोड़ा जाए, ताकि उन्हें भविष्य में स्थायी सहारा मिल सके।
मानवीय प्रशासन की मिसाल
जिला प्रशासन का कहना है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में पीड़ित परिवारों को अकेला नहीं छोड़ा जाएगा और संकट की घड़ी में हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।
शांति राणा की कहानी यह बताती है कि जब व्यवस्था संवेदनशील हो, तो टूटती उम्मीदों को भी नया जीवन मिल सकता है।
