गैर जरुरी पदों पर नियुक्तियां, बड़े निगमों में बरकरार हैं रिक्तियां !

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उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार विभिन्न विभागों में दायित्वधारियों (निगम- बोर्डों के चेयरमैन) की नियुक्ति करने में लगी हुई है। मगर प्रतिष्ठापूर्ण व बड़े निगमों में वर्षों से अध्यक्ष समेत अन्य पदाधिकरियों की नियुक्ति नहीं की जा रही हैं। इन बड़े निगमों में बोर्ड का गठन नहीं होने से जहां रूटीन कामकाज में दिक्क्तें पैदा हो रही हैं, वहीं भाजपा कार्यकर्त्ता भी नियुक्तियां न होने पर हैरान हैं।
अब तक करीब पांच दर्जन से अधिक भाजपा नेताओं की ताजपोशी
भाजपा सरकार द्वारा अब तक करीब पांच दर्जन से अधिक नेताओं को विभिन्न विभागों की सलाहकार समितियों, आयोगों, प्राधिकरणों आदि में अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के रूप में ताजपोशी की जा चुकी है।
गैर जरुरी पदों पर कईयों की नियुक्ति
सरकार ने भाजपा नेताओं को एडजस्ट करने के लिए वरिष्ठ नागरिक कल्याण परिषद, उत्तराखंड पारिस्थितिकीय पर्यटन सलाहकार परिषद, उत्तराखंड वन एवं पर्यावरण सलाहकार समिति, प्रदेशीय मौन परिषद आदि जैसे कई पद सृजित किए हैं और उन पर तैनाती कर दी है।
समाज कल्याण विभाग के अधीन सृजित किए गए उपाध्यक्ष, वरिष्ठ नागरिक कल्याण परिषद जैसे पद पर करीब चार भाजपा नेताओं की नियुक्ति की गई है। इन पदों पर नियुक्त नेताओं को भी शायद पता नहीं होगा कि उनका काम क्या है ?
महत्वपूर्ण निगमों में वर्षों से पद रिक्त
प्रदेश में उत्तराखंड वन विकास निगम, गढ़वाल मंडल विकास निगम(GMVN) व कुमायूं मंडल विकास निगम (KMVN) जैसे बड़े निगमों में अध्यक्ष समेत बोर्ड मैंबरों के पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं। वन निगम में मई, 2024 तक पूर्व विधायक कैलाश गहतोड़ी कार्यरत रहे हैं। उनके निधन के बाद से यह पद रिक्त चला आ रहा है।
गहतोड़ी 2022 के विधानसभा चुनाव में चंपावत विधान सभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए थे। मुख्यमंत्री धामी के लिए उन्होंने अपनी सीट से इस्तीफा दिया था, जिससे धामी उपचुनाव लड़कर निर्वाचित हुए। उसके पश्चात गहतोड़ी को वन निगम के अध्यक्ष की कुर्सी मिली थी।
बिना बोर्ड गठन के चल रहा कामकाज
वन निगम, GMVN व KMVN जैसे निगम राजनीतिक रूप से न केवल प्रतिष्ठापूर्ण माने जाते हैं, अपितु संसाधनों की दृष्टि से भारी भरकम भी। ये निगम अपने एक्ट से संचालित होते हैं और इनमें महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए अध्यक्ष समेत पूरे बोर्ड का होना जरुरी होता है। बोर्ड के जरिए प्रस्ताव पारित किए जाते हैं।
ऐसे में यह कल्पना करना कठिन नहीं है कि बिना अध्यक्ष व बोर्ड के इन निगमों का कामकाज किस प्रकार से संचालित हो रहा होगा ?
महिला आयोग, बाल संरक्षण आयोग ‘कार्यवाहक’ व्यवस्था पर
महिलाओं और बच्चों के अधिकारों व कल्याण के लिए कार्य करने वाले महिला आयोग और बाल संरक्षण आयोग के अध्यक्ष के पद कार्यवाहक व्यवस्था के तहत चल रहे हैं। महिला आयोग की अध्यक्ष कुसुम कंडवाल व बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ गीता खन्ना का कार्यकाल जनवरी, 2025 में समाप्त हो चुका है।
प्रदेश सरकार ने दोनों अध्यक्षों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद इन्हें अग्रिम आदेशों तक अपने पद पर कार्य करने के निर्देश जारी किए हैं। मगर एक वर्ष से अधिक का समय होने को है और दोनों महत्वपूर्ण आयोग कार्यवाहक व्यवस्था से संचालित हो रहे हैं।
आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि सरकार अलग-अलग चरणों में महिला आयोग में कई उपाध्यक्षों की नियुक्ति कर चुकी है। पर अध्यक्ष पद कोई निर्णय नहीं हो सका।
मंडियों में भी अध्यक्ष पद रिक्त
प्रदेश में विभिन्न स्थानों पर छोटी-बड़ी करीब डेढ़ दर्जन मंडियां हैं। इन मंडियों में अध्यक्ष नियुक्त होते हैं। कई भाजपा नेता वर्षों से उम्मीद लगाए बैठे थे कि सरकार उनको मंडी परिषद में नामित कर सम्मान देगी। मगर उनकी उम्मीदें धरी रह गई हैं। सरकार इन मंडियों को सरकारी प्रशासकों के भरोसे चला रही है।
कार्यकर्ताओं को सम्मान नहीं, अधिकारी उठा रहे लाभ
भाजपा नेता भले ही इन मामलों में खुल कर नहीं बोलते हैं। मगर आंतरिक बातचीत में वे अपनी पीड़ा जाहिर करने से नहीं चूकते हैं। उनका मानना है कि कार्यकर्त्ता इस उद्देश्य से चुनाव में पार्टी के लिए जी-जान से जुटता है कि सरकार आने पर उसे भी सम्मान मिलेगा। कार्यकर्ताओं की नियुक्ति वाले पदों को खाली छोड़ने से सरकार पर आर्थिक बोझ कम नहीं होता है। बल्कि उन पदों से जुड़े लाभ सरकारी अधिकारी उठाते हैं।
क्या होते हैं दायित्वधारी ?
प्रदेश सरकार द्वारा विभिन्न निगमों, बोर्डों, समितियों में नियुक्त किए जाने वाले राजनीतिक नियुक्तियों को दायित्वधारी कहा जाता है। विभिन्न सरकारों में इनकी सुविधाओं व स्तर में अलग-अलग प्रावधान किए जाते रहे हैं। मोटे तौर पर प्रत्येक दायित्वधारी को निर्धारित मानदेय के अलावा वाहन, कार्यालय, व्यक्तिगत सहायक, TA/DA की सुविधा संबंधित विभागों द्वारा दी जाती है।
कभी-कभी सरकार कुछ दायित्वधारियों को कैबिनेट अथवा राज्यमंत्री का दर्जा भी प्रदान करती है। मगर धामी सरकार में किसी भी दायित्वधारी को किसी प्रकार का दर्जा नहीं मिला है। बावजूद इसके कई दायित्वधारी अपने को दर्जाप्राप्त राज्यमंत्री लिख रहे हैं।
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