हरीश का अर्जित अवकाश : कांग्रेस की ‘अंदरूनी बदहजमी’, भाजपा की ‘मन चाही मुराद’

अप्रैल माह की शुरुआत में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के 15 दिन के अर्जित अवकाश की घोषणा ने उत्तराखंड कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी को एक बार फिर सतह पर ला दिया है। यह घटना 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुई है, जब कांग्रेस लगातार दो बार (2017 और 2022) सत्ता से बाहर है और हाईकमान की कोशिशों के बावजूद एकजुटता दिखाने की कोशिश कर रही थी।
मुद्दे का असामान्य विस्तार: मीडिया और नैरेटिव निर्माण
हरीश रावत द्वारा लिए गए अवकाश का मुद्दा हाल के समय में उत्तराखंड की राजनीति और मीडिया में असामान्य रूप से प्रमुखता से उभरा। यह प्रश्न उठता है कि क्या यह स्वाभाविक जन-चिंता थी या सुनियोजित रूप से इसे उछाला गया—
राज्य में कई गंभीर मुद्दे मौजूद हैं। इसके बावजूद एक व्यक्तिगत निर्णय को “राजनीतिक संकट” के रूप में प्रस्तुत किया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि राजनीतिक नैरेटिव को मोड़ने की कोशिश हो सकती है, जिससे वास्तविक मुद्दे पीछे चले जाएं।
राजनीतिक लाभ-हानि का समीकरण
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इससे किसे लाभ हुआ? सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए यह स्थिति एक “डाइवर्जन” की तरह देखी जा सकती है। विपक्षी दल कांग्रेस, जो हाल में आक्रामक रणनीति अपना रही थी, उसका फोकस बिखर गया। इस दृष्टि से यह तर्क सामने आता है कि अवकाश विवाद ने सत्तारूढ़ पक्ष को राहत दी और विपक्ष को रक्षात्मक बना दिया।
मीडिया और इंटरनेट पर चर्चा
मीडिया रिपोर्ट्स व सोशल मीडिया पर इसे हरीश रावत की नाराजगी का प्रतीक माना जा रहा है। कुछ विश्लेषक इसे कांग्रेस की ‘अंदरूनी बदहजमी’ कह रहे हैं, जो कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित कर रही है।
कुछ विश्लेषक इसे हरीश रावत का रणनीतिक कदम मान रहे हैं। उनका कहना है कि कांग्रेस हाईकमान द्वारा रावत को एक तरह से हाशिये पर धकेल दिया गया है। इसलिए उन्होंने अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए अवकाश जैसा हथियार अपनाया।
अटकलें : भाजपा में शामिल होंगे हरीश रावत
कई विश्लेषक और सोशल मीडिया यूज़र्स अटकलें लगा रहे हैं कि रावत का यह कदम भाजपा के लिए कंफर्ट फील करा रहा है। रावत ने गाहे-बगाहे मुख्यमंत्री धामी की तारीफ़ भी की हैं और उनके ख़ास समर्थक विधायक हरीश धामी ने मुख्यमंत्री धामी के लिए अपनी विधायकी छोड़ने तक का ऐलान किया था।
तो ऐसे में वे क्या भाजपा का रुख करेंगे ?
घटना का क्रम और तथ्य
विगत 28 मार्च को नई दिल्ली में कांग्रेस ने तीन पूर्व विधायकों समेत छह नेताओं को पार्टी में शामिल किया। इनमें भाजपा के पूर्व विधायक और कुछ निर्दलीय नेता शामिल थे। यह कार्यक्रम कांग्रेस की ‘अटैकिंग पॉलिटिक्स’ का हिस्सा माना गया।
इस ज्वाइनिंग में हरीश रावत के करीबी रामनगर के पूर्व ब्लॉक प्रमुख संजय नेगी (जो पहले कांग्रेस से निष्कासित थे) की भी घर वापसी होनी थी। मगर उनकी ज्वाइनिंग को आलाकमान ने अंतिम क्षण में टाल दिया। रावत खुद नेगी की पैरोकारी कर रहे थे। इस उपेक्षा से आहत होकर रावत ने तंज भरे अंदाज में 15 दिन का ‘अर्जित अवकाश’ घोषित कर दिया। उन्होंने इसे अपनी 60 साल की राजनीतिक यात्रा के बाद ‘सोच-विचार और मंदिर दर्शन’ का समय बताया।
कांग्रेस के कार्यकर्ता हतोत्साहित
कांग्रेस 2027 के उत्तराखंड विधानसभा चुनावों को ‘करो या मरो’ मान रही है। प्रदेश कांग्रेस प्रभारी कुमारी सैलजा ने 8 अप्रैल से उत्तराखंड का पांच दिवसीय दौरा रखा है।
मगर हरीश प्रकरण से पार्टी की हालिया ‘अटैकिंग पॉलिटिक्स’ और नए चेहरों की ज्वाइनिंग का सकारात्मक प्रभाव धूमिल पड़ता दिखाई दे रहा है। 2027 के लिए बनी संभावनाएं फिर से सवालों के घेरे में हैं।
प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल के नेतृत्व में पार्टी ने हाल में भाजपा सरकार पर हमले तेज किए थे। कुछ नेताओं के कांग्रेस में शामिल होने से संगठन को मजबूती मिलने के संकेत भी मिले थे, लेकिन ताजा घटनाक्रम ने इन प्रयासों पर असर डाला है।
