गैंगस्टर पर सरकारी मेहरबानी? 50 से ज्यादा मुकदमों के आरोपी विक्रम को किसने दिलाया शस्त्र लाइसेंस?

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कांग्रेस सरकार में स्टोन क्रेशर की अनुमति तो भाजपा सरकार में हथियार का लाइसेंस—प्रशासनिक मिलीभगत या सियासी संरक्षण?

विगत 2-3 दिनों से सोशल मीडिया में झारखंड के कुख्यात गैंगस्टर विक्रम शर्मा को उधमसिंह नगर में स्टोन क्रेशर लगाने की अनुमति का पत्र वायरल हो रहा है। यह अनुमति वर्ष 2013 में, तब की कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के कार्यकाल में दी गई थी। बहुगुणा भले ही वर्तमान में भाजपा में हैं। मगर पत्र को जिस अंदाज़ में वायरल किया जा रहा है, उसने सियासी रंग ले लिए है। यह आरोप लगाया जा रहा है कि पत्र को वायरल करा कर भाजपा गैंगस्टर विक्रम को संरक्षण देने का सारा ठीकरा कांग्रेस के सिर फोड़ना चाहती है।

स्टोन क्रेशर की अनुमति पत्र के शोर में एक गंभीर और महत्वपूर्ण मुद्दा दब सा गया है। यह मुद्दा गैंगस्टर को शस्त्र लाइसेंस जारी करने का है। अमर उजाला की खबर के मुताबिक विक्रम शर्मा ने 2022-23 में उधमसिंह नगर जिले से हथियार के लिए लाइसेंस लिया था और यह लाइसेंस एक अफसर की संस्तुति पर दिया गया था। खबर के अनुसार शस्त्र लाइसेंस जारी होने से पांच साल पहले वह देहरादून से ही झारखंड पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया था। यह बात मीडिया व सोशल मीडिया में आयी थी कि वो कुख्यात अपराधी है।

गैंगस्टर विक्रम को कांग्रेस सरकार में स्टोन क्रेशर की अनुमति मिली थी तो इससे भी गंभीर यह है कि भाजपा सरकार में उसे शस्त्र लाइसेंस जारी हो गया। ऐसे में उत्तराखंड में शस्त्र लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया सवालों के घेरे में है। कुख्यात गैंगस्टर को शस्त्र लाइसेंस जारी होने के खुलासे के बाद प्रशासनिक प्रक्रिया, सत्यापन तंत्र और पुलिस रिपोर्ट की भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि किस अधिकारी की संस्तुति पर गैंगस्टर को लाइसेंस जारी कर दिया गया? उस अधिकारी ने भी अपने स्तर पर उसकी पड़ताल किए बिना फाइल को मंजूरी दे दी?

सवाल और भी बहुत हैं। गैंगस्टर को लाइसेंस जारी करने वाले अधिकारियों की भूमिका को जांच के दायरे में लिया जाएगा? जिस अधिकारी की संस्तुति पर शस्त्र लाइसेंस दिया गया उस पर कार्रवाई होगी? क्या आपराधिक पृष्ठभूमि की जांच में लापरवाही हुई? क्या लाइसेंस जारी करने में राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव था?

इस मामले से यब भी उजागर हुआ है कि जहां एक आम नागरिक को शस्त्र लाइसेंस बनवाने के लिए लंबी प्रक्रिया, सत्यापन और कई स्तर की जांच से गुजरना पड़ता है, वहीं कुछ प्रभावशाली लोगों के मामलों में प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान हो जाती है। ऐसे में यह भी सवाल है कि शस्त्र लाइसेंस जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में प्रशासनिक स्तर पर हुई गंभीर लापरवाही से प्रदेश सरकार कुछ सबक लेकर कुछ ठोस कदम उठाएगी?

विक्रम झारखंड का एक कुख्यात गैंगस्टर था। उस पर 50 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज थे, जिनमें हत्या के आरोप भी शामिल हैं। वह लंबे समय से राजधानी देहरादून में रह रहा था। विगत 13 फरवरी को देहरादून के सिल्वर सिटी मॉल के पास वह जिम से बाहर निकल रहा था, तभी बाइक सवार हमलावरों ने उस पर गोलियाँ बरसा दीं। वह मौके पर ही गिर गया और उसकी मौत हो गई। उस समय वह खुद भी पिस्टल साथ ले जा रहा था, लेकिन हमलावरों ने उसे जवाब देने का मौका नहीं दिया। पुलिस उसके हमलावरों की खोज में जुटी हुई है।

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